Saturday, August 6, 2011

ऐसी मोहब्बत


हाय ! ऐसी मोहब्बत

इस भरी दोपहरी में, क्यूँ शमा जलाए बैठी हो |
किसका इंतजार है , जो द्वार खोले बैठी हो||


ये कैसी तलब है, जो पलके बिछाए बैठी हो|
ये कैसी तन्हाई है, जो बेचैन हुए बैठी हो
||

निकला पतझड सावन, निकला बसंत-बहार |
किसका इंतजार है, जो आस लगाए बैठी हो ||


कैसे कैसे राज़ जो ख़ामोशी ने छिपायें रखे है |
हाय ! ऐसी मोहब्बत जो परदेसी से कर बैठी हो ||




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8 comments:

  1. बहुत सुन्दर्।

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  2. बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति!
    लगता है कि ये आपके दिल की आवाज है!
    और हो भी क्यों नहीं?
    बरसात का मौसम है न!

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  3. pardeshi aakhir pardeshi hi hote hain bahut intjaar karate hain.bahut achchi kavita likhi hai.badhaai.

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  4. बहुत सुन्दर रचना , बहुत सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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