Saturday, July 30, 2011

मेरे पापा की कहावत

 काशी जैसी भोर नहीं, 

बंबई जैसी शाम नहीं,
कोलकाता जैसी रात नहीं। 


कासी मुनडनम 
गया पिनडनम
ईलाहाबाद स्नानं 


सब तीर्थ बार बार 
गंगा सागर एक बार 

13 comments:

  1. बहुत ही सुन्दर |
    बधाई ||

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  2. कहावतें तो बहुत अच्छी हैं, लेकिन सुधार कर लें तो और अच्छी लगेंगी।
    काशी जैसी भोर नहीं,
    बंबई जैसी शाम नहीं,
    कोलकाता जैसी रात नहीं।

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  3. नीलेशजी से सहमत...लिखने से पहले अगर वर्तनी शुद्धि कर ली जाए तो सोने पे सुहागा हो जाए...

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  4. It's true ! Nothing could be more beautiful than the mornings of Holy city Varanasi .

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  5. bahut hi sundar varnan. Itni sundar ki galtiyaan nazr hi nahi aa rahi. Bilkul sachhi kahavat.

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  6. सुंदर कथन, सुंदर चित्र।
    आपके पापा की कहावतें बिलकुल सही हैं।

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  7. बहुत सुन्दर चित्रों से सजी हुई पोस्ट!

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मैं अपने ब्लॉग पर आपका स्वागत करती हूँ! कृपया मेरी पोस्ट के बारे में अपने सुझावों से अवगत कराने की कृपा करें। आपकी आभारी रहूँगी।

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